Monday, 31 May 2021

शगुन के लिफ़ाफे! ग़ज़ल : मुरारी राय



 शगुन के लिफाफे 


100 शगुन से सजे रहते थे लिफाफे ।

अब तो 100 रुपए से भरते है लिफ़ाफे ।।


जल्दी से पकड़ा कर लिफ़ाफा, पिंड छुड़ाते है लोग।

न परिचय न खेर-खबर ,पैर छूने से शरमाते है लोग।।


रिश्तों में गर्माहट कहां,पीठ फिरे भूला देते है लोग ।।

हाल पूछने की फुर्सत किसे, अपनी व्यथा सुनाते हैं लोग।।


उस दौर में दूसरों से भी हाल जान लेते थे लोग

अब तो सामने होकर भी बगलें झांकते है लोग।।


जब भी खुशियां मनाते, सब कुछ लुटा देते थे लोग।

अब तो ख़ुशी पाकर भी मुंह छिपा लेते है लोग।।


रिश्तों का रस पीने को पैदल ही चले आते थे लोग।। 

अब तो जल्दी की कहकर यूं ही निकल जाते है लोग।।


लिफाफा ना था पर सीने से लपेट कर रखते थे लोग।

अब तो दूर ही दूर भागने में कामयाब हो गए हैं लोग।।


संबंधों से संबंधी मिलें, रिश्तों के गुलशन महकाते थे लोग ।

अब संपर्क कर लेना भी, भारी बोझ समझ लेते है लोग।।


लिफाफों की भूख किसे , हम तो रिश्ते चमकाने मिले।

क्या खूब निभाया संग मित्र,हम तो मर्यादा निभाने मिले।


बदलाव लाने निकला ही था कि बादल छा गए।

लौट कर देखा तो, फूल रिश्तों के मुरझा गए।।


कलम ने पकड़ रखीं है उम्मीदें सीने में ।

वरना रिश्ते तो जल रहे है लिफाफे में।।


*Good morning have a wonderful day*✍️

मुरारी लाल राय 

शिक्षक


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