Friday, 14 May 2021

औकात एक अनोखी कल्पना



 ‘मेरी पहचान –मेरी औकात’-एक ईश्वर जो हमारे साथ रहता है!

 हे ! ईश्वर |

सर्वप्रथम आपको नमन करता हूँ |और प्रार्थना करता हूं कि मुझे ‘मेरी पहचान-मेरी औकात’ विषय पर लिखने की प्रेरणा और शक्ति दें | आपके आशीर्वाद से में अपने प्रयास में सफल हो सकूँ|

वेदों के अनुसार - आत्मा ईस्वर का रूप है | मेरा लेख इसी तथ्य पर आधारित है कि यदि आत्मा होती है और वह ईस्वर का अंश है तो हम अपने जीवन में इसका अनुभव कब कब और कहाँ-कहाँ कर पाते है | इस पुस्तक में इसी कथन को विस्तार से जानने का प्रयाश किया है | पुस्तक जेसे जेसे आगे बदती जाएगी आपको कई रोचक जानकारियाँ प्राप्त होंगी जिनके आधार पर आपको आत्मा के होने का संकेत स्वमं होने लगेगा | ये सभी तथ्य आभासी ,अद्रश्य एवं भावनात्मक होंगे |इन्हें विस्तार से समझने हेतु आपको पुस्तक अंतिम पंक्ति तक पढ़नी चाहिए |

अपने थोड़े से ज्ञान ,अनुभव और कल्पनाओं के आधार पर   ‘मेरी पहचान –मेरी औकात’-एक ईस्वर जो हमारे साथ रहता है ! पुस्तक में व्यक्ति के साथ ईस्वर के साथ होने के तथ्यों को वास्तविकता से जोड़ने का प्रयाश किया गया है |

इस विषय पर लिखने की प्रेरणा तब मिली जब एक दिन मुझसे पुछा गया की ‘मेरी औकात किया है’ ?ऐसी घड़ी में स्तब्ध रह गया क्योंकि ये सब किसी दूसरा पूछता तो न जने बात कहाँ तक जाती | पर ये तो मेरे किसी अपने ने ही पूछा था जिसे मेरे संसार में आने से आज तक का सम्पूर्ण जीवन चरित्र स्वयं अपनी आँखों से देखा था | जब प्रश्न किया गया है तो उसका उत्तर भी होता होगा ! इसीलिए लिए अपने इस दुनिया में आने की ‘वास्तविक पहचान –मेरी औकात’- ‘ईश्वर’ जो हमारे साथ रहता है की संज्ञा दे रहा हूँ | आज के प्रश्न जिसका उत्तर अपने आदरणीय को सुनना था की खोज अन्दर ही अन्दर करता रहा और परेशान भी रहा |

इस प्रश्न ने मुहे कई रातों को सोने नहीं दिया दिन में सही से खाने नही दिया मुझे चुनोती बनता जा रहा था की इतना पढ़ा लिखा क्या काम का जब मुझे अपनी पहचान अपनी औकात का हे ज्ञान नहीं कर पाया | कुछ दिनों में ही अपने सभी परिचित के अध्यापकों , मित्रों व् जान पहचान के लोगों से इस प्रश्न (जो अब एक गंभीर विषय बन चूका था ) पर चर्चा करने के उपरांत भी कोई ठोस जबाव के खोज नहीं कर पाया था | फिर जेसा हम अपनी परीक्षा में करते है की यदि प्रश्न का उत्तर न बन रहा हो तो कुछ मिलता जुलता ‘गप्पी’ जबाव लिख देते है | अतः मेने भी अपना निष्कर्ष निकाल लिया की किसी को कुछ पता नहीं की ‘ औकात क्या होती है ? संभवतः यही दशा आप की इस पुस्कत को पढ़ते समय हो रही होगी |

अब मेरे लिए प्रश्न से अधिक एक खोज करनी के लिए सबसे बड़ी पहेली बन गया है तो इसे विस्तार से जानने हेतु इसे में अपना लक्ष्य बनाना ही उचित लगा | फिर ये तो मेरे अस्तित्व साथ आप सभी  पर भी प्रश्न चिन्ह लगा चूका था|  अब आपको मेरे साथ –साथ आपको अपनी ‘औकात भी जानने की उत्सुकता हो रही होगी | चलिए तो पन्ने पलटिये और मेरे साथ एक लम्बी यात्रा पर निकाल चलते है जहाँ में आपको अपनी कल्पना के सागर में अद्भुत द्रश्यों का दर्शन करूँगा |

कात जो एक नकारात्मक ऊर्जा वाला शब्द है अर्थात इस शब्द को सुनते ही हमारी इन्द्रियों में नकारात्मक रोष पैदा होता है | इसे आम या साधारण चर्चा का प्रश्न नहीं बनाया जा सकता ना ही इस विषय पर चर्चा कर किसी सज्जन से मित्रता का भाव की अपेक्षा की जा सकती है |    

         यहाँ आपको स्पस्ट कर देना चाहता हूँ की किताब को सामाजिक रूप से या समूह के साथ न पढ़ा जाए तो बेहतर होगा | क्योंकि इसकी नकारात्मक ऊर्जा के कारन आप सम्बेगों की अंधी में बह सकते है |

यह किताब मात्र कल्पनाओं पर आधारित है वास्तविकता से सम्बन्ध मात्र संयोग होगा !

किताब को पढ़ते दौरान मेरे कई मित्रों की मनोदशा में परिवर्तन होगा , आपके विचारों में बदलाब भी आएगा , एवं आपका संसार को देखने का नजरिया भी कुछ हद तक वदल सकता है | में पहले भी स्पस्ट कर चूका हूँ की विषय गंभीर है | बहुत ही उत्सुकताओं से भरा है | किताब का प्रतेक तथ्य अपने आप में बहुत बड़ा ‘खोज का विषय’ हो सकता है \ किताब में ईस्वर के साथ संवादों का वर्णन पढने को मिलेगा जो सिर्फ मेरी स्वंय की कल्पना मात्र होगी | अंततः मेरे आत्मा के रूप औकात को जानने के प्रयाश को अधिक गंभीर न मान कर ‘शौकिया’ सामग्री समझ कर अवस्य पढ़ें! क्योंकि इसमें हर अवस्था के लोगों को बहुत कुछ सीखने को मिलेगा | आप भी अपनी आत्मा का सही विश्लेषण आर सकेंगे | किताब के अध्ययन उपरांत आप अपनी वास्तविक पहचान अपनी ‘औकात’ को समझने \ जानने के सही तरीके इस किताब के माध्यम से प्राप्त कर सकेंगे |

 






विषय सूची

01.  औकात ... शाब्दिक अर्थ |

02.  आपकी औकात क्या है ?

03.  ईश्वर और औकात के मध्य का भेद |

04.  अपनी औकात को कैसे जान सकते है

05.  औकात होने के प्रमाण|

06.  सारांश |















पहला अध्याय :- औकात ... शाब्दिक अर्थ !

अरबी – हिंदी शब्दकोष के अनुसार ‘औकात --- है | औकात शब्द अरबी तथा फारसी भाषा का संयुक्त रूप है | इसका अर्थ हिंदी व अंग्रेजी में निम्नलिखित मिलता है –

समय (टाइम), प्रतिष्ठा (status), मान-मर्यादा(dignity) व  साहस(Courage)|

“ जब भी निकला हूँ औकात कि सरहद के परे !

मेरे हमराह चले आये , ज़माने कितने ||”

उपरोक्त उर्दू शेर भी इसी शब्द के अर्थ के साथ लिखा मिलता है | यदि में कहूँ की व्यक्ति समय की सरहद पार कर जाता है तो उसके उसके चाहने बालों की भीड़ उसके ही रस्ते पर चल देती है |

   इस व्यापक और गंभीर बिषय को इस शब्दकोष से समझना मेरे लिए कठिन था | क्योंकि इसके पर्यायवाची अर्थों में अप्सिसमंता या मिलाप नहीं दीखता |साथ ही कोई ठोस तथ्य भी नहीं निकलता | जिससे अपनी दुबिधा मिटाई जा सके | हां यदि शब्दों को विस्तृत रूप दे कर समझ जाए तो अर्थ अवस्य निकाल सकता हूँ | मेने अपने अनुसार इन शब्दों को निम्न विस्तार दे कर जोड़ा है –


अ.समय (Time):-

   समय एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है | जो निरंतर चलायेमान रहती है, तथा अपना प्रभाव डालती है उसी समय चक्र के फेर से हमें सुख-दुःख , आशाएं-निराशाएं, भाग्य-दुर्भाग्य व् अच्छा – बुरा जेसे शब्दों का प्रयोग कर विशेषण कर समय के प्रभाब को प्रदर्शित करते है |अर्थात समय क कैसा  प्रभाव हम पर या हमारे जीवन पर पढ़ रहा है |उसका आंकलन हम उपरोक्त विश्लेषणों के द्वारा आभास करते है | हमारे आस-पास बहुत से लोग यह कहते मिल जायेंगे कि “ भाई ,अभी मेरा समय ख़राब चल रहा है या अच्छा नहीं है |

उपरोक्त कथन में हमने सुना कि समय अच्छा या बुरा होता होता तभी ये लोग येसी चर्चा करते सुनाई देते है | अतः यह स्पस्ट हो जाता है की की व्यक्ति का अच्छा बुरा समय हमें उसकी उस समय की ‘औकात ‘ की स्थिति का अभाश करा सकती है |इस लिए औकात के पर्यायवाची के रूप में समय को रखा जा सकता है | क्योंकि  इसके सही ज्ञान से औकात को जाना जा सकता है | समय के साथ औकात का समानुपाती सम्बन्ध है यदि समय ख़राब है तो औकात भी औकात भी कमजोर हालत में होगी|

ब. प्रतिष्ठा (status):-

समय के साथ-साथ प्रतिष्ठा भी किसी व्यक्ति की औकात प्रभावी होती है | हमारे अधिकांश कार्य , कामनाएं ,हरी प्रतिष्ठा से प्रभावित होती है| यदि प्रतिष्ठा समय के साथ सही है तो व्यक्ति का प्रभाव बढ़ जाता है | सामाजिक स्तर पर उसके कार्यों को सरलता से पूर्ण होने में सहयोग मिलता है |

यदि विचार करें तो अच्छे समय से ही व्यक्ति की प्रतिष्ठा बढती है |जो इस बात का संकेत करती है की उस व्यक्ति की ‘औकात‘ अच्छे स्तर पर है | और इस समय उसके प्रभ को हम भली भांति देख सकते है | अतः बिचार करें की व्यक्ति की प्रतिष्ठा के स्तर से ही उसकी पहचान उसके सामाजिक परिवेश में बन या बिगड़ सकती है | अर्थात हम औकात के इस पर्यावाची रूप में औकात को किसी व्यक्ति कि समाज में पहचान के तौर पर समझ सकते है |

   उपरोक्त विश्लेषण या विचार से हमने जाना कि व्यक्ति की प्रतिष्ठा का समय के समान समानुपाती संबंध है | ‘ किसी प्रतिष्ठित व्यक्ति की ‘औकात’ भी उछ होगी | एवं इसके विपरीत प्रतिष्ठा में गिरावट होने पर औकात उल्टा प्रभाव दिखाएगी|

स. मान-मर्यादा (Dignity):-

किसी व्यक्ति की मान मर्यादा का आकलन उसके समाज के साथ सम्बन्ध,किसी सामाजिक आयोजन में उसकी सहभागिता हमें उस व्यक्ति के मान मर्यादा के स्तर पर को स्पष्ट कराते हैं | यदि व्यक्ति अपने सामाजिक संबंधों की गहराई समझता है व उनके अपने समाज के साथ के प्रति व्यवहार उचित है तो कहा जा सकता है की वह मान मर्यादा वाला व्यक्ति है | साथ ही किसी सार्वजनिक स्थल पर दिखने वाली उसकी प्रतिक्रिया उसका व्यवहार भी हमें उसकी मान मर्यादा के स्तर का बोध कराते है |

 साहस courage -

 इसके पहले हमने जाना व्यक्तित्व की व्यक्ति अपनी प्रतिष्ठा का निर्माण करता है और समाज में अपने लिए  मान  पाता है। ऐसी स्थिति में व्यक्ति को औकात अत्यधिक प्रभावशाली बनाता है। अंतिम पर्यायवाची शब्द है साहस । यदि ऊपर वर्णित तीनों यदि सकारात्मक है तो इस दशा में व्यक्ति का साहस भी उतना ऊंचा ओर सुद्रण हो जाता है। उसका आत्मविश्वास सातवें आसमान पर होता है। 

  ऐसी दशा में कोई भी व्यक्ति अपनी चरम सीमा को छू सकता है । कोई भी लक्ष्य आसानी से कम प्रयास से ही प्राप्त कर सकता है। 

  अंततः में कह सकता हूं कि यदि व्यक्ति सही समय में अपनी प्रतिष्ठा को अपने व्यवहार व मान मर्यादा से अपने साहस को बड़ा कर अपनी पूर्णता को पा सकता है। ऐसी स्थिति में उस व्यक्ति की मदद ईश्वर द्वारा की जाती है,और उसकी औकात का बंधन उसके व ईश्वर के मध्य अच्छी तरह जुड़ने से वो व्यक्ति अपने उद्देश्यों में सफल होता है । 



अध्याय -2   आपकी औकात क्या है ?


हां आपसे ही पूछा है जी हां आपसे । आखिर आपकी औकात क्या है । क्या आप अपनी औकात जानते है । क्या आप अपना व्यवहार अपनी औकात में रहकर कर रहे हैं। यदि नहीं तो आपको अपनी औकात में रहकर बात करनी होगी।

मेरे परम आदरणीय, सम्मानित पाठकों से निवेदन करूंगा कि वे मेरे उपरोक्त कथनों को स्वयं से जोड़ कर ना देखें ।


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