Friday, 7 May 2021

अपने ‘लॉकडाउन’ 2.0 को यादगार बनायें ! लेख - मुरारी राय 'गप्पी"


    अपने ‘लॉकडाउन' 2.0 को यादगार बनायें !

जी, हाँ ये सही है कि आप इस संकट और विपत्ति के समय को भी ‘यादगार’ बना सकते है | कोरोना वायरस के कारण आज हम ही नहीं अपितु सम्पूर्ण विश्व घरों में कैद होने को विवस है | हम मनुष्य है और मानव का मूल मन्त्र ही परिवर्तन है | जैसे धर्म समय, देश , काल और परिस्थिति के अनुसार निर्धारित किया जाता रहा है | इसलिए हमें भी अपनी दिनचर्या को समय के अनुकूल बदलते रहना होगा |

  साथियों आप की अपनी बहुत सारी समस्याएं, परेशानियां होंगी जिसे भलीभांति महसूस कर सकता हूँ | मुझे भी आपकी तरह सुबह होने पर घूमने जाना है | दोस्तों संग सुबह-सुबह खेल का आनंद लेना है | अपने घर के लिए बहुत कुछ खरीद कर लाना है| अपने कार्यालय के लिए भी तैयारी करनी है| पर क्या करें समय का संकेत है की अभी सब कुछ छोड़ कर जीवन बचाने का उपाय जो मात्र घर में कैद रहना ही है| तो क्या हम घर पर यूँ ही हाथ पर हाथ रखें बेठे रहे |

    "जी विल्कुल नहीं", तो अब आप जानना चाह रहें होंगे कि हम क्या करें कि हमारा ये समय भी कुछ यादगार बनया जा सके| इस हेतु में कुछ सुझाव आप सभी तक पंहुचाना चाहता हूँ आशा है आप इन सुझाबों का लाभ अवस्य लेंगे| 

      इस कोरोना आपदा को अवसर कैसे बनाये इसे कुछ बिन्दुओं के माध्यम से समझें:-

01 पर्यावरण व परिवेश के महत्त्व को जानें

02 अपनी अंतरात्मा व अंतर्मन को जानें |

03 अपने आध्यात्म ज्ञान में वृद्धि करें |

04 अपनी छुपी प्रतिभाओं को पहचाने और उन्हें और कुशल बनायें|

05 अपने कार्य व्यवहार का पुनर्मूल्यांकन करें |

06 भविष्य के लिए चिंतन-मंथन कर योजनायें व्यबस्थित करें |

07 अंततः अपने अस्तित्व को पहचानें |

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01 पर्यावरण व परिवेश के महत्त्व को जानें

      सब जीवों को अपने अस्तित्व को बनाये रखने के लिए पर्यावरण पर निर्भर रहना ही होगा | बिना पर्यावरण मनुष्य क्या सम्पूर्ण जगत से जीव जंतुओं के अस्थित्व की कल्पना नहीं की जा सकती | वर्तमान परिस्थितियों ने मनुष्य को पर्यावरण के महत्व का आभास बहुत अच्छे से करा दिया है | हम सब जिस प्राणवायु (O2) को पल पल ग्रहण कर रहें है| एक समय जरूरत होने पर कर्ण के वरदान की भांति हमारा साथ छोड़ सकती है | 

    अतः पर्यावरण को स्वच्छ, निर्मल और शुद्ध बनाने के कर्तव्य निर्वहन  सभी मनुष्य जाति को करना चाहिए | जानकारों ने तो यहाँ तक लिखा है कि प्रकृति ने मनुष्य को सबसे अधिक गुणों से परिपूर्ण किया है, किन्तु स्वंय मनुष्य ने इस प्रकृति को हानि पहुचाई है | यहाँ आपको अपने और पर्यावरण के सम्बन्ध के गूड रहस्य को समझना अति आवश्यक हो जाता है कि क्यों मनुष्य को धरतीपुत्र के नाम से संबोधित किया गया है |  यह कथन भी पूर्णतः सत्य है कि हम प्रकृति की ही संताने है | आप जानना चाह रहें होंगे की यदि हम प्रकृतिकी संतति है तो फिर हमारे माँ-बाप कौन है? हमें जन्म तो इन्होने दिया है फिर हम प्रकृति की संतान कैसे ?

    अंग्रेजी के महान लेखक विलियम वर्ड्सवर्थ ने लिखा है कि हमारी जीव-आत्मा जब स्वर्ग में रह कर  आनंद ले रही होती है, तो हमारी आत्मा पृथ्वी पर लोटना ही नहीं चाहती ! इस समाश्या के निवारण हेतु हमारी धरती माँ हमारी जीव आत्मा से विनय कर कहती है कि “हे! परम-पिता परमात्मा के दिव्य अंश यदि तुम मेरे साथ नहीं चलोगे तो मेरे आंगन की शोभा किसके लिए है? कौन मेरें मन मंदिर को अपने कोलाहल से आन्दित करेगा! ? अतः हे जीव आत्मा आप मेरे साथ चलो, में आपको वचन देती हूँ कि आपको स्वर्ग के समान ही सुख और आनंद हेतु सुव्यस्थित वातावरण प्रदान करुँगी |”

      आप ये तो भलीभांति जानते ही होंगे, कि हम सब अपनी प्रकृति माँ के आँचल से लिपट कर ही पले-बड़े है | हमने अपने जीवन के सुख-दुःख को धरती माँ के आंगन में भोगा है| कल्पना कीजिये यदि प्रकृति आपकी माँ नहीं होती तो क्या आपके लिए इतने सुख-सुबिधाओं को उपलब्ध कराती | जब आपको गर्मी लग रही होती है तो शीतलता देने के लिए उसने पेड़ उगाये होंगे! जब शीतऋतू होती है तो सूरज कि गर्मी आपको राहत देता है | आप चाहें तो उसके सूखे पेड़ों का सहारा भी ले सकते है! जब आप उदास या निराश मन किये होते है तो बसंत आपके जीवन में रस घोल देता है ! ये पंछियों की चहचाहट, आपको कितने मधुर गीत सुनाया करती है ! 

    प्रकृति की महिमा तो उस विशालकाय समुद्र की तरह है जिसकी थाह लेना हम साधारण मनुष्य के वस में नहीं | ऋषिओं मुनियों ने अपने तपोबल से इसका गुड रह्श्य जानकर प्रकृति की महिमा का मनोहारी और अदभुत  वर्णन वेदों उपनिषदों और पुराणों में किया है| मेरा ज्ञान और शब्द भंडार तो अभी सूक्ष्म ही भरा है | फिर भला में किस मुख से इसके महत्त्व का बखान करूँ | आप स्वयं अपने अन्दर मन में झांके और पर्यावरण व परिवेश के महत्त्व को खोजने का प्रयाश करें |

      इस समय जब हम अपने घरों में कैद है तो हमने अपनी प्रकृति माँ की महिमा का आभास करने का पर्याप्त समय मिल रहा है तो इन सब बातों का चिंतन-मनन करेंप्रकृति माँ ने हमारे जीवन के अस्तित्व को बनाये रखने हेतु कितने सुन्दर सुन्दर प्रबन्ध किये है| जब आप अपनी प्रकृति माँ की महिमा को और अधिक गहराई व् निकटता से जान जांएगे तो फिर इसके महत्व और अस्थित्ब का ख्याल सदा रखेंगे | इन पर्यावरण के घटकों मुख्यतः जल, थल, वायु और नव को स्वच्छ बनाये रखने का संकल्प लें | इस हेतु अपना योगदान देने की कारगर योजना का निर्माण करें कि "जिस प्रकृति माँ ने अभी तक मुझे सब कुछ मुफ्त देकर मेरा पालन पोषण किया है अब मेरा भी परम कर्तव्य होगा कि में भी अपनी प्रकृति माँ के लिए बहुत कुछ करूं ! पेड़ लगाऊ , पेड़ कटने से बचाऊँ | वायु जो आज बहुत दूषित हो गई है को जितना हो सके और अधिक दूषित होने से बचाने का प्रयाश किया जाए |" 

   साथियों योजनायें बनाने से पहले हमें चुनोतियों और मूल समस्याओं की पहचान कर लेनी होगी | आपके इस संकल्प हेतु मेरे पास एक कार्य योजना है की कैसे हम प्रकृति माँ की सेवा कर सकते है तो  समयाओं की सूची में संभवतः ये कुछ बिंदु अवश्य सामिल करें –

 01 पोलीथिन के विशालकाय ढेर,

 02 विषेली हवाएं,

 03 दूषित जल स्त्रोत

 04 वंजर कृषि भूमि और

 05 सामान्य से गर्म जलवायु  आदि   

                                         शेष कहानी अगले दिन ..,,

अपने परिवार सहित सकुशल घर में रहें और सुरक्षित रहें। 

राधा-रानी का आशीर्वाद सदैव हम सब पर बना रहे।

\\ राधे -राधे \\

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Murari Lal Rai

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अपने ‘लॉकडाउन’ को यादगार बनायें !

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