Thursday, 24 June 2021

चले आओ स्कूल ।

 


*चले आओ स्कूल ।*

🎓🎒🕺⛹️‍♀️⛹️‍♂️🤼‍♀️🧘‍♀️🧘‍♂️🥇🏆🎗️🎨

संकट अब टलने वाला है,

नया सवेरा होने वाला है।

बहुत हुआ अब तो लौट आओ स्कूल।

प्यारे मित्रों अब तो चले आओ स्कूल।।


नव निर्माण करेंगे

सपने साकार करेंगे

दुनियां दर्शन करने, अब लौट आओ स्कूल,

नन्हें मुन्ने नवांकुर, अब चले आओ स्कूल।


नए विचार सीखेंगे

नए समाचार देखेंगे

नए मित्रों से मिलने, अब लौट आओ स्कूल।

नए सत्र से पढ़ने, अब चले आओ स्कूल।।


याद सताती होगी

बहुत रुलाती होगी

करने हंसी ठिठोली, अब लौट आओ स्कूल।

नटखट शरारतें करने अब चले आओ स्कूल।।


नई कितावें खोलो 

क्या लिखा है, बोलो,

नव युग निर्माण करने अब लौट आओ स्कूल

'नवोदय' करने अब चले आओ स्कूल।।


@गप्पी

Sunday, 20 June 2021

बापू! तेरे कंधे पर सिर रखकर ....|

 


बापू! तेरे कंधे पर सिर रखकर ....|

 

में तो कुछ पाने निकला था .. पर सब कुछ लुटा बैठा |

उम्मीद बहुत थी कमाने की, पर घर-वार छुटा बैठा ||

अब तो लौट कर ‘माँ’.. तेरी लोरी सुनने का मन करता है |
बापू तेरे कंधे पर सिर रखकर, रोने का मन करता है ||

 

स्कूल ने जो न सिखाया, वो जमाना सिखाया करता है

आपने जो दस्तूर बताया ज़माने का, ये तो रुलाया करता है  

पर अपनों को ठहरा-सा देखकर, रुक जाने का मन करता है |

बापू तेरे कंधे पर, फिर से बैठ जाने का मन करता है ||

 

ऊंचाई से है बैर जिन्हें, क्यों फ़िक्र करू उनके ताने का |

अब आंसू छिपा कर, सीख लिया हुनर मुस्कुराने का ||

अब तो ऐसी ऊंचाई से, छिप जाने का मन करता है |

ओ! बापू तेरे कंधे पर , सोने का मन करता है ||

 

बहुत दूर हूँ, पर अव तेरे साये में, लोट आने का मन करता है |

बापू तेरे कंधे पर सिर रखकर, खुल के रोने का मन करता है ||

बहुत थक गया हूँ , अब तो रुक जाने का मन करता है |

ओ ! बापू तेरे कंधे पर सिर रख कर , सोने का मन करता है ||

रचना:- मुरारी लाल राय `गप्पी

S/0 श्री अशोक राय (सरपंच टीला)

Friday, 11 June 2021

कहां चल दिए l कविता मुरारी लाल राय

 


*कहां चल दिए,,,,।

*(कोरोना से जो हमें छोड़कर चले गए, उन सभी को मेरी श्रद्धांजलि स्वरुप कविता)*

🌹🌹💐🌷💐🌹🌹


कह रहे थे, बाजार से  गुलाब जामुन लाऊंगा

खुद को गुलाबों में लपेट कर, कहां चल दिए।।।


जाते हुए मुड़ कर भी न देखा, न पानी पिया,

कुछ बात तो करते, अकेले अकेले कहां चल दिए।।


जाना जरूरी था तो कुछ समझा तो दिया होता 

बिना कुछ समझाए,बिना बताए कहां चल दिए।।


हमें कभी अकेले घर से बाहर पैर रखने न दिया ,

आज हमें छोड़कर चौराहे पर आप कहां चल दिए।।


कमी कभी किसी काम की कुछ होने नहीं दी

आज बिना बताए,घर बार सौंपकर कहां चल दिए।।


थोड़ा आराम तो कर लेते, थके हुए से आए थे 

दवाएं भी तो खानी थी, बिना कुछ खाए कहां चल दिए।


छोटी पूछती रही उसके खिलौनों का क्या हुआ

हम खिलोने ही तो थे, इन्हे तोड़ कर कहां चल दिए।


जाने का तो कभी खेल खेला ही नहीं था हमने 

खेल पूरा हुआ नहीं, अधूरा इसे छोड़कर कहां चल दिए ।।


हम सब के बहुत सारे बादे, कैद थे हमारे बीच,

मम्मी को भी कुछ बताना था, पर आप कहां चल दिए।।


याद तो बहुत हमें किया होगा, तड़प भी तो हुई होगी

हमें तड़पता छोड, रिश्ते नाते तोड़कर कहां चल दिए।।


कभी याद आए या  वक्त मिले तो फिरसे लौट आना

हमें अपनी यादों के सहारे छोड़ कर कहां चल दिए।।


अधूरा अधूरा सा लगता है सारे ज़माने का रैला

कहां चल दिए थमा के अपनी जिम्मेदारियों का थैला।।


याद तो बहुत आओगे, पर किसी को दिखा न सकूंगी

मां का हाल बुरा है, छोटी को सच्चाई बता न सकूंगा।।


आपका भाई 

मुरारी लाल राय

🙏😭😭🙏

Wednesday, 9 June 2021

जय हो घर वाली मैया की। कविता - मुरारी लाल राय




 जय हो घर वाली मैया की ।।

(सभी घर वाली माताओं बहनों को समर्पित )


तुम हम सबको, दुनियां में लाती

तुम हम सबको, पालने में झुलाती

तुम दो कुलों का भवन चमकाती

तुम हम सबका आंगन महकाती।।

ऐसी घर वाली मैया तुम्हें बार बार प्रणाम।

बार बार प्रणाम,मैया तुम्हें बार बार प्रणाम।1।


हम सब तेरे हाथ का खाते ,

फल सब तेरे प्रेम का पाते।

तुम हो सागर, तुम्ही हो धरती,

करती सेवा, कष्टों को हरती।।

ऐसी घर वाली मैया तुम्हें बार बार प्रणाम।

बार बार प्रणाम,मैया तुम्हें बार बार प्रणाम।2।


पत्थर पूजुं या पूजे पूरा पहाड़।

कोई न जानें, काहे करें खिलवाड़।।

तुम हम सबका, जब पेट भराए

भजन की माला तब कोई फिराए।

ऐसी घर वाली मैया तुम्हें बार बार प्रणाम।

बार बार प्रणाम,मैया तुम्हें बार बार प्रणाम।3।


सब कोई सुने, तुम्हारी हरी गाथा।

 हम सबकी हो तुम भाग्य विधाता ,

प्रेम भाव से जो कोई तुम्हें मनाता

फिर न कोई दुखड़ा उसे सताता।।

ऐसी घर वाली मैया तुम्हें बार बार प्रणाम।

बार बार प्रणाम,मैया तुम्हें बार बार प्रणाम।4।


मुरख हैं इस जग के कछु प्राणी ,

तुम्हें देखत ही बोलत कटु वाणी 

नासमझी से तुम्हे जो कोई हाथ लगावत,

जीवन भर कष्टों की न कोई पीर मिटाबत

ऐसी घर वाली मैया तुम्हें बार बार प्रणाम।

बार बार प्रणाम,मैया तुम्हें बार बार प्रणाम।5।


तुम्हे आजादी कम ही भाती, 

में कुल दीपक तुम हो वाती ।

सब जग जाने, फैले जग ख्याति ,

जाकी रोटी खाते सब दिन राती।।

ऐसी घर वाली मैया तुम्हें बार बार प्रणाम।

बार बार प्रणाम,मैया तुम्हें बार बार प्रणाम।6।


तुम ही सबका बंश बेल बड़ाती,

तुम ही हमको सद मार्ग चड़ाती।

अपने दुखड़े तुम लो छुपाती,

सबको मनाती, खूब हंसाती।।

ऐसी घर वाली मैया तुम्हें बार बार प्रणाम।

बार बार प्रणाम,मैया तुम्हें बार बार प्रणाम।7।


काल भी उसका कछू न करता

जो कोई शरण में तुम्हारी रहता 

तुम हो सवरी ,तुम्ही अनुशुईया

तुम हो सावित्री, तुम्ही सीता मैया

ऐसी घर वाली मैया तुम्हें बार बार प्रणाम।

बार बार प्रणाम,मैया तुम्हें बार बार प्रणाम।8।


जय हो माता , जय हो भगनी,

जय हो बेटी , जय हो धरणी।

जय हो देवी, जय मंगल करनी,

जय हो भार्या, जय जग जननी।।

घर वाली मैया की, जो जन सच्ची सेवा करता ।

जीवन जी भर जीता, फिर वो बैकुंठ को टरता।9।


ऐसी घर वाली मैया तुम्हें बार बार प्रणाम।

बार बार प्रणाम,मैया तुम्हें बार बार प्रणाम।।


(घर का अर्थ साधारण घर से नहीं है, अपितु संपूर्ण विश्व को ही घर मान लिया है)

दिनांक 09/06/2021 दिन बुधवार 

आपका 

मुरारी लाल राय ' गप्पी '

शिक्षक


Tuesday, 8 June 2021

मेरी प्यारी पर दादी ! कविता - मुरारी लाल राय


 मेरी प्यारी पर दादी !

कुछ रूठी-सी, कुछ भोली-भाली सी !

कुछ दादी-सी, पर बिलकुल माँ जैसी ,बहुत प्यार किया करती थी मेरी पर दादी !

 

जब मुझसे नाता छुड़ा चुके थे ,

अपने मन की सुना चुके थे,

निवाले खिला पाल रही थी मेरी बडबोली पर दादी !

 

फ़र्ज सब अपने भुला चुके थे,

कर्ज समझ कर गुला चुके थे

कांपते हाथों से धूल भरी सूरत धुलाती थी मेरी पर दादी !

 

फ़र्स पर खिसकती रहती

तीन पैरों पर खड़ी रहती,

मुझे खड़ा करने का अपना फ़र्ज निभा रही थी मेरी पर दादी |

 

बन सकूँ एक दिन बड़ा आदमी

कमी न कभी आड़े हाथ आये,

अठन्नी भी बचत की पल्लू में बांधा करती थी मेरी पर दादी !

 

खाना कम खाऊ तो ,

डाट से एक दो चपत लगाती ,

अपने कांपते हाथों से पेट भर खिलाती थी मेरी पर दादी |

 

लोग उनको बूड़ी बाई बुलाते,

पर हिम्मत कहाँ जो उन्हें चिड़ाते ,

सो की उम्र में अपने सो धर्म निभाती थी मेरी पर दादी |

 

खुद कभी न पड़ी होंगी ,

पर मुझे रोज स्कूल भिजाती ,

जीवन में पढ़ाई का महत्व सिखाती थी मेरी पर दादी !

 

कभी अपनों से रोता था,

तो कभी चैन से न सोता,

सीने से चिपका के, रात भर लोरी सुनाती थी मेरी पर दादी !

 

चेहरा मुरझाया सा था,

बाल भूरे से थे उनके ,

मुझे लेप लगाती, काले टीके से सजाती थी मेरी पर दादी !

 

माटी के खिलौने बनाती,

लड़कों के घरौंदे सजाती ,

घर के कोने में, तुलसी की माला भजति थी मेरी पर दादी !


कांपती, खांसती खाकारती ,

पर खुद को खुद ही संवारती,

दादा जी प्रेम में चूल्हे पर खुद खाना पकाती थी मेरी पर दादी !


हाथ कंगन, मोटे पैजनिया

सोने की मोती, मटर माला

बो निर्मोही, सब कुछ मुझ पर लुटाती थी मेरी पर दादी |

 

बड़े पूण्य धर्म किये होंगे कर्मों के,

कष्ट भी तो सहे होंगे अपने दुखड़ों के,

पर  परियों की कहानी सुनाकर, खूब हँसाती थी मेरी पर दादी  !

 

आपकी दुआओं से खूब फल-फ़ूल रहा हूँ, म्रें !

ईश्वर से आपको लौटाने का बोल रहा हूँ, में !

आप ही मेरा साहस, आप ही मेरी प्रेरणा हो !

आप ही मेरी दादी माँ, आप ही मेरी यशोदा हो ||

 

मंगलवार, 8 जून 2021

 

आपका पोता

मुरारी लाल राय

सरकारी मास्टर

 

 

 


Monday, 7 June 2021

बिना अंको की पाती! किस काम की।।




बिना अंको की पाती! किस काम की।।

(बिना परीक्षा के पास होने पर हास्य व्यंग कविता)


पाती अंक बिना

पक्षी पंख बिना

होली रंग बिना

साथी संग बिना

किस काम का, किस काम का।।


नाव  पतवार बिना

छुट्टी  इतवार बिना

फरारी रफ़्तार बिना

रोज़ा इफ्तार बिना

किस काम का ,किस काम का


चंदा चकोर बिना 

प्रेम विभोर बिना 

छत पटोर बिना

चटनी चटोर बिना

किस काम का, किस काम का।।


राजा राज बिना

गाना साज बिना 

नर नाज़ बिना 

नारी लाज बिना  

किस काम का, किस काम का।।


इंजन रेल बिना 

कढ़ाई तेल बिना 

तराजू बांट बिना 

बचपन डांट बिना 

किस काम का, किस काम का।।


बिहार लालू बिना,

समोसा आलू बिना,

ग्वाला दूध बिना 

लाला सूध बिना 

किस काम का, किस काम का।।


डाक्टर आला बिना

दरवाजा ताला बिना 

ससुराल साला बिना 

माली माला बिना 

किस काम का, किस काम का।।


मंज़िल कष्ट बिना

सफाई डस्ट बिना

लोहा रस्ट बिना 

मॉडल मस्ट बिना 

किस काम का, किस काम का 


खाना नमक बिना 

सोना खनक बिना 

चोरी सनक बिना 

हीरा चमक बिना 

किस काम का, किस काम का।।


ब्रज रास बिना,

जुआ तास बिना,

कविता हास बिना 

घोड़ा घास बिना 

किस काम काम, किस काम का


प्यार झप्पी बिना 

चौपाल टप्पी बिना 

गाल पप्पी बिना 

गप्प ' गप्पी ' बिना 

किस काम का, किस काम का।।


आपका

मुरारी लाल राय ' गप्पी '

पुत्र श्री अशोक राय (टीला)

Mob 9179765560

(पाती- कागज,मार्कशीट, फरारी- सबसे तेज दौड़ने वाली गाड़ी। पटोर- पत्थर का बड़ा टुकड़ा।नाज़ - गर्व )






Sunday, 6 June 2021

छोटी सी गलत फहमी,,।

 


छोटी सी गलत फहमी,,।

अच्छे अच्छे रिश्तों को उखाड़ सकती हैं ये ग़लत फहमियां।

जरा सी चूक क्या हुए , नजरों से गिरा सकती हैं गलत फहमियां।।


लौट कर कोई नहीं पूछेगा , असल बात क्या थी।

लोग कट कर देते है डोर , मगर बात क्या थी।।


वर्षों लगे थे गुलशन को सजाने में , एक तूफान सा आया मेरे घराने में ।

अक्सर आग लगते फिरते लोग, तुम देर न करना उसे बुझाने में ।


जब घर अपना है, बर्तन भी खनकते  होंगे ।

कोई गिरा न दे उन्हें, चाबी रखो सिरहाने में ।।


बेवजह डांट दिया, परायों के बहकावे में ।

घर मेरा उजाड़ दिया, झूटों को मानने में।।


गर प्रेम है तो क्रोध बाजिव है, अपनों को समझाने में।

पर कुछ वक्त तो देना था, हमें अपनी बात बताने में ।।

में लाख बुरा हूं, पर साफ़ तुम भी नहीं ।

फरमान सुनाया है,पर फरिश्ते भी नहीं।।


रिश्ते नाते प्यार वफ़ा, कनकों सी माला।

कहीं कुतर न दे, गलतफहमी की ज्वाला।।


रिश्तो को मिटा सके,  ताकत कहां ज़माने की ।

न आने देना फहमी, लो कसम इन्हें निभाने की।।

रिश्ते हैं सच्ची पूंजी,कभी उसे न गवाँ देना ।

 धीरज धरना ,अपनों से रिश्ते  निभा लेना।।

आपका 

मुरारी लाल राय 

शिक्षक 




Friday, 4 June 2021

में हूं गप्पी!

 


मैं हूं गप्पी।


कोई कहे मोहे ज्ञानी, कोई समझता अभिमानी।

में हसमुख सा, कलार OBC का सादा सा प्राणी।।


कोई सुनता है मुझसे बातें , कोई सुनावत बातें।

में संघर्षी, ना सो पाऊं कई दिन और कई रातें।।


टीला निवासी, महल अटारी में कभी रह न सका ।

में तंगहाली, अपने अधूरे वादों को निभा न सका।।


ठोकरें खाते खाते , ग़म खाना सीख गया।

में सहनसी, रूठों को मनाना सीख गया।।


कम पढ़ा हूं, पड़ा रहा बड़े नवोदय के आवास में ।

में दुखिया , फर्क न समझा अपनों के  विश्वास में ।।


कम आयु था, कलंक लगा मेरे अधूरे इतिहास में।

में अभागी,जिंदा बना रहा बिना दूध और प्यास में ।।


नाम जिसने रखा मेरा, वो मतलब न बता गई।।

में दोषी सा, गलती है क्या? माई न रटा गई।।


ठोकर से ठोस बना, ग़म पी कर सदां हंसता रहा ।

में जोकर सा, बिना बात के वादों में फंसता रहा ।।


है मुझमें भी लाख बुराई, न जानूं अपनों की चतुराई।

में शक्कर सा मीठा बोलूं, मिटाता फिरता पीर पराई।।


जो जानें हीरो कहते, न जाने तो अधूरा जीरो समझें।

में रंगमंची, सब हंसी देखते, आंसू मेरे मोती समझें।।


हूं अकेला, रहता जीभ सा दांतों के इस काय में ।

में गप्पी सा, गप्पें सुनाता संकट के इस साय में।।


सबसे हो प्रेम, बैर किसी से होने न पाए।

में मार्गदर्शी, पैर किसी के कांटे न आए।।


सबका हो कल्याण, बच्चे मेरे भी फूलें- फलें ।

में अज्ञानी , चलो फिर से किसी स्कूल चलें।।


जीवन जल का बुलबूला , प्रेम करें, घुले मिलें।

में खौजी सा, ख़ुशी ख़ुशी अपने घर लौट चलें ।।


आपका

 मुरारी लाल राय गप्पी'

शिक्षक


Wednesday, 2 June 2021

भविष्य के लिए योजनायें व्यबस्थित करें । (Lockdown को यादगार बनाएं श्रृंखला का अगला भाग)





 अध्याय 06 ;- भविष्य के लिए योजनायें व्यबस्थित करें

(Lockdown को यादगार बनाएं श्रृंखला का अगला भाग)

जी, नमस्कार दोस्तों कहानी के पिछले भाग में आपने पढ़ा कि हम अपने किए गए कृत्यों को चिंतन कर आगे आने वाले समय में इन कमियों को दूर करने हेतु प्रयास करना चाहिए। इसी प्रकार अब आप के लिए नई चुनौती है पिछले को तो नहीं सुधारा जा सकता है पर आने वाले समय को अवश्य हम उचित मार्गदर्शन से बेहतर बना सकते हैं। ये बात भी सही है कि इंसान दूसरों से बेहतर बनना चाहता है । वो भविष्य में अधिक से अधिक प्रभाव छोड़ना चाहता है किन्तु यदि आप की योजनाएं अच्छी नहीं है तो फिर ये विचार मात्र सपने बन कर रह जाएंगे । 

हमें अपने जीवन में क्या क्या उपलब्धियां हासिल करनी है , हमें। क्या क्या कार्य अपने समाज , अपने देश ,अपने बच्चों व स्वयं के लिए करने है । इन सबका blueprint तैयार कर लेना चाहिए। परीक्षा में सफलता प्राप्त करने हेतु हम जिस प्रकार ब्लूप्रिंट का उचित प्रबंध कर अच्छे अंक प्राप्त कर सकते हैं। हमारे आने वाले दिनों के लिए हमारे कार्य विभाजन से ही मनोवांछित सफलता प्राप्त होगी । 

अतः आने वाले समय के लिए हमारे पास कोई ठोस ब्लूप्रिंट होना चाहिए । अब आपको चिंता हो रही होगी कि जीवन के ब्लूप्रिंट का खाका तैयार कैसे करें? दोस्त आप को परेशान होने की आवश्यकता नहीं है। आपका जिम्मेदार दोस्त होने के नाते मैं इस समस्या के लिए कुछ गप्पे सुनाकर आपका मनोरंजन करता हूं।

   दोस्त , आने वाला समय न ही अपने देखा है और न मैने । हम सब इसके अच्छे होने के लिए ईश्वर से प्रार्थना भी करते है। परन्तु विचार कीजिए क्या हम अपने आने वाले समय को अधिक महत्वपूर्ण और उपयोगी बनाने का ईमानदारी से प्रयास कितना करते है । महामारी का संकट पिछले एक साल से बना हुआ है, और आगे भी बना रह सकता है, किन्तु मेरी चिंता का विषय यह है कि क्या हमने आने वाले समय हेतु सकारात्मक विचारों , नवाचारों को स्वीकार किया है या नहीं। महामारी के प्रभाव से दुनिया नए सिरे से विचार करने को विवश है । चाहे कोई सा वर्ग हो सभी लोग बहुत अंदर तक इस संकट से जूझ रहे हैं। हमारे सपने और आय के स्त्रोत सब चकना चूर हो गए हैं। देश की सत्ता से भी अधिक लाभ की आशा भी नहीं है । 

   युवाओं को रोजगार मिलेगा या नहीं यह तो आज के दौर का सबसे बड़ा प्रश्न है । युवा पीढ़ी दर दर की ठोकरें खाने को विवश है, न तो कोई ठोस ब्लूप्रिंट है न कोई मार्गदर्शन करने वाला। देश की सच्ची शक्ति युवाओं से होती है। और यदि युवा पीढ़ी दिशाहीन है, उसकी भावनाएं आहत हैं तो देश , कैसे महाशक्ति बनने का सपना देख सकता है? इस महशक्ती बनाएगा कौन ? आज 2 जून की रोटी की कोई स्थाई वारंटी नहीं है तो फिर कौन हमारे देश को आगे बढ़ा सकेगा । भूखे पेट ना भजन,,,, जब देश को अपनी ही आवश्यकताएं पूरी नहीं हुई थी तो दुनिया में खैरात बांट देने से किसका भला हुआ ? ये सब तो नेताओं को शोभा देता है कि खूब बातें करना और वास्तविक उपाय कभी न बताना । 

चलो में नेता तो नहीं मैंने आपका मित्र होना स्वीकारा है अतः मित्र के नाते कड़वी हकीकत बयां करता हूं कि आप शीशे में देख कर नीतियां न बनाएं नीतियां बनाने के लिए अपने अंदर के मन में झांके । आपका मन मुझसे भी कहीं अधिक होशियार है। और किसी से भी अधिक ईमानदार । आपके मन को आपकी औकात का पता है। अपनी योग्यताओं का ज्ञान है । वो भविष्य हेतु आपको तैयार करने में अधिक मदद कर सकता है। मन से मेरा आशय है आपकी अंतरात्मा की आवाज़। 

 जी हां , में या मुझ जैसे हजार लोग भी आपको सफल नहीं बना सकते। हा एक शिक्षक की भांति आपके रास्ते से पत्थर अवश्य हटा सकते हैं, रास्ते चुनने में मदद कर सकते हैं किन्तु आखिर में चलना तो आपको स्वयं है । ऐसे में अगर कोई आपका सच्चा साथी हो सकता है तो वो है आपका अंदरूनी मन , अंदरूनी आवाज ही ईश्वर की आवाज है, ईश्वर ही आपको मंजिल तक पहुंचा सकते हैं। वे है हमारी जीवन यात्रा को सफल बनाने में मदद कर सकते हैं। अतः यदि आप अपने अंदरूनी मन की आवाज़ सुनना सीख जाते है तो आपको किसी दूसरे व्यक्ति या साधनों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा । ईश्वर हमें और आपको इस दुनियां में लेकर आए हैं तो कोई तो खास वजह होगी । कोई तो योजना बनाई गईं होगी। इसीलिए हमारे लिए अपनी अलग से किसी योजना बनाने की आवश्यकता नहीं होगी। 

    हमें तो अपने आप को हमारे जन्मदाता , पालनहार, रखवाले उस परमपिता परमेश्वर के श्री चरणों में समर्पित कर देना चाहिए और उनके ही  निर्देशों को मानकर अपने क्रियाकलाप करने की रूपरेखा बनाना चाहिए । यह चिंतन और मनन के द्वारा संभव है। ईश्वर ने हमने किसी विशेष कार्य हेतु ही संसार का सुख लेने हेतु जन्म दिया है अतः अपने उस खास और विशेष उद्देश्य को अपने अंदर ही खोजें। में  आपको इतना  आश्वासन अवश्य दे सकता हूं कि आप मेरे सुझाव से कभी निराश नहीं होंगे । 

धन्यवाद।

आपका 

मुरारी लाल राय 

(अंदर के मन को कैसे समझा जा सकता है। इस विषय पर चर्चा अगले अध्याय में आपको पढ़ने को मिलेगी)