Sunday, 20 June 2021

बापू! तेरे कंधे पर सिर रखकर ....|

 


बापू! तेरे कंधे पर सिर रखकर ....|

 

में तो कुछ पाने निकला था .. पर सब कुछ लुटा बैठा |

उम्मीद बहुत थी कमाने की, पर घर-वार छुटा बैठा ||

अब तो लौट कर ‘माँ’.. तेरी लोरी सुनने का मन करता है |
बापू तेरे कंधे पर सिर रखकर, रोने का मन करता है ||

 

स्कूल ने जो न सिखाया, वो जमाना सिखाया करता है

आपने जो दस्तूर बताया ज़माने का, ये तो रुलाया करता है  

पर अपनों को ठहरा-सा देखकर, रुक जाने का मन करता है |

बापू तेरे कंधे पर, फिर से बैठ जाने का मन करता है ||

 

ऊंचाई से है बैर जिन्हें, क्यों फ़िक्र करू उनके ताने का |

अब आंसू छिपा कर, सीख लिया हुनर मुस्कुराने का ||

अब तो ऐसी ऊंचाई से, छिप जाने का मन करता है |

ओ! बापू तेरे कंधे पर , सोने का मन करता है ||

 

बहुत दूर हूँ, पर अव तेरे साये में, लोट आने का मन करता है |

बापू तेरे कंधे पर सिर रखकर, खुल के रोने का मन करता है ||

बहुत थक गया हूँ , अब तो रुक जाने का मन करता है |

ओ ! बापू तेरे कंधे पर सिर रख कर , सोने का मन करता है ||

रचना:- मुरारी लाल राय `गप्पी

S/0 श्री अशोक राय (सरपंच टीला)

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