बापू! तेरे कंधे पर
सिर रखकर ....|
में तो कुछ पाने निकला था .. पर सब कुछ लुटा
बैठा |
उम्मीद बहुत थी कमाने की, पर घर-वार छुटा बैठा
||
अब तो लौट कर ‘माँ’.. तेरी लोरी सुनने का मन
करता है |
बापू तेरे कंधे पर सिर रखकर, रोने का मन करता है ||
स्कूल ने जो न सिखाया, वो
जमाना सिखाया करता है
आपने जो दस्तूर बताया ज़माने
का, ये तो रुलाया करता है
पर अपनों को ठहरा-सा देखकर,
रुक जाने का मन करता है |
बापू तेरे कंधे पर, फिर से
बैठ जाने का मन करता है ||
ऊंचाई से है बैर जिन्हें, क्यों
फ़िक्र करू उनके ताने का |
अब आंसू छिपा कर, सीख लिया हुनर
मुस्कुराने का ||
अब तो ऐसी ऊंचाई से, छिप
जाने का मन करता है |
ओ! बापू तेरे कंधे पर ,
सोने का मन करता है ||
बहुत दूर हूँ, पर अव तेरे
साये में, लोट आने का मन करता है |
बापू तेरे कंधे पर सिर रखकर, खुल के रोने का मन
करता है ||
बहुत थक गया हूँ , अब तो रुक
जाने का मन करता है |
ओ ! बापू तेरे कंधे पर सिर
रख कर , सोने का मन करता है ||
रचना:- मुरारी लाल राय `गप्पी
S/0 श्री अशोक राय (सरपंच
टीला)

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