*कहां चल दिए,,,,।
*(कोरोना से जो हमें छोड़कर चले गए, उन सभी को मेरी श्रद्धांजलि स्वरुप कविता)*
🌹🌹💐🌷💐🌹🌹
कह रहे थे, बाजार से गुलाब जामुन लाऊंगा
खुद को गुलाबों में लपेट कर, कहां चल दिए।।।
जाते हुए मुड़ कर भी न देखा, न पानी पिया,
कुछ बात तो करते, अकेले अकेले कहां चल दिए।।
जाना जरूरी था तो कुछ समझा तो दिया होता
बिना कुछ समझाए,बिना बताए कहां चल दिए।।
हमें कभी अकेले घर से बाहर पैर रखने न दिया ,
आज हमें छोड़कर चौराहे पर आप कहां चल दिए।।
कमी कभी किसी काम की कुछ होने नहीं दी
आज बिना बताए,घर बार सौंपकर कहां चल दिए।।
थोड़ा आराम तो कर लेते, थके हुए से आए थे
दवाएं भी तो खानी थी, बिना कुछ खाए कहां चल दिए।
छोटी पूछती रही उसके खिलौनों का क्या हुआ
हम खिलोने ही तो थे, इन्हे तोड़ कर कहां चल दिए।
जाने का तो कभी खेल खेला ही नहीं था हमने
खेल पूरा हुआ नहीं, अधूरा इसे छोड़कर कहां चल दिए ।।
हम सब के बहुत सारे बादे, कैद थे हमारे बीच,
मम्मी को भी कुछ बताना था, पर आप कहां चल दिए।।
याद तो बहुत हमें किया होगा, तड़प भी तो हुई होगी
हमें तड़पता छोड, रिश्ते नाते तोड़कर कहां चल दिए।।
कभी याद आए या वक्त मिले तो फिरसे लौट आना
हमें अपनी यादों के सहारे छोड़ कर कहां चल दिए।।
अधूरा अधूरा सा लगता है सारे ज़माने का रैला
कहां चल दिए थमा के अपनी जिम्मेदारियों का थैला।।
याद तो बहुत आओगे, पर किसी को दिखा न सकूंगी
मां का हाल बुरा है, छोटी को सच्चाई बता न सकूंगा।।
आपका भाई
मुरारी लाल राय
🙏😭😭🙏

No comments:
Post a Comment