मेरी प्यारी पर दादी !
कुछ रूठी-सी, कुछ भोली-भाली सी !
कुछ दादी-सी, पर बिलकुल माँ जैसी ,बहुत प्यार किया करती थी मेरी पर दादी !
जब मुझसे नाता छुड़ा चुके थे ,
अपने मन की सुना चुके थे,
निवाले खिला पाल रही थी मेरी बडबोली पर दादी !
फ़र्ज सब अपने भुला चुके थे,
कर्ज समझ कर गुला चुके थे
कांपते हाथों से धूल भरी सूरत धुलाती थी मेरी पर दादी !
फ़र्स पर खिसकती रहती
तीन पैरों पर खड़ी रहती,
मुझे खड़ा करने का अपना फ़र्ज निभा रही थी मेरी पर दादी |
बन सकूँ एक दिन बड़ा आदमी
कमी न कभी आड़े हाथ आये,
अठन्नी भी बचत की पल्लू में बांधा करती थी मेरी पर दादी !
खाना कम खाऊ तो ,
डाट से एक दो चपत लगाती ,
अपने कांपते हाथों से पेट भर खिलाती थी मेरी पर दादी |
लोग उनको बूड़ी बाई बुलाते,
पर हिम्मत कहाँ जो उन्हें चिड़ाते ,
सो की उम्र में अपने सो धर्म निभाती थी मेरी पर दादी |
खुद कभी न पड़ी होंगी ,
पर मुझे रोज स्कूल भिजाती ,
जीवन में पढ़ाई का महत्व सिखाती थी मेरी पर दादी !
कभी अपनों से रोता था,
तो कभी चैन से न सोता,
सीने से चिपका के, रात भर लोरी सुनाती थी मेरी पर दादी !
चेहरा मुरझाया सा था,
बाल भूरे से थे उनके ,
मुझे लेप लगाती, काले टीके से सजाती थी मेरी पर दादी !
माटी के खिलौने बनाती,
लड़कों के घरौंदे सजाती ,
घर के कोने में, तुलसी की माला भजति थी मेरी पर दादी !
कांपती, खांसती खाकारती ,
पर खुद को खुद ही संवारती,
दादा जी प्रेम में चूल्हे पर खुद खाना पकाती थी मेरी पर दादी !
हाथ कंगन, मोटे पैजनिया
सोने की मोती, मटर माला
बो निर्मोही, सब कुछ मुझ पर लुटाती थी मेरी पर दादी |
बड़े पूण्य धर्म किये होंगे कर्मों के,
कष्ट भी तो सहे होंगे अपने दुखड़ों के,
पर परियों की कहानी सुनाकर, खूब हँसाती थी मेरी पर दादी !
आपकी दुआओं से खूब फल-फ़ूल रहा हूँ, म्रें !
ईश्वर से आपको लौटाने का बोल रहा हूँ, में !
आप ही मेरा साहस, आप ही मेरी प्रेरणा हो !
आप ही मेरी दादी माँ, आप ही मेरी यशोदा हो ||
मंगलवार, 8 जून 2021
आपका पोता
मुरारी लाल राय
सरकारी मास्टर

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