Tuesday, 8 June 2021

मेरी प्यारी पर दादी ! कविता - मुरारी लाल राय


 मेरी प्यारी पर दादी !

कुछ रूठी-सी, कुछ भोली-भाली सी !

कुछ दादी-सी, पर बिलकुल माँ जैसी ,बहुत प्यार किया करती थी मेरी पर दादी !

 

जब मुझसे नाता छुड़ा चुके थे ,

अपने मन की सुना चुके थे,

निवाले खिला पाल रही थी मेरी बडबोली पर दादी !

 

फ़र्ज सब अपने भुला चुके थे,

कर्ज समझ कर गुला चुके थे

कांपते हाथों से धूल भरी सूरत धुलाती थी मेरी पर दादी !

 

फ़र्स पर खिसकती रहती

तीन पैरों पर खड़ी रहती,

मुझे खड़ा करने का अपना फ़र्ज निभा रही थी मेरी पर दादी |

 

बन सकूँ एक दिन बड़ा आदमी

कमी न कभी आड़े हाथ आये,

अठन्नी भी बचत की पल्लू में बांधा करती थी मेरी पर दादी !

 

खाना कम खाऊ तो ,

डाट से एक दो चपत लगाती ,

अपने कांपते हाथों से पेट भर खिलाती थी मेरी पर दादी |

 

लोग उनको बूड़ी बाई बुलाते,

पर हिम्मत कहाँ जो उन्हें चिड़ाते ,

सो की उम्र में अपने सो धर्म निभाती थी मेरी पर दादी |

 

खुद कभी न पड़ी होंगी ,

पर मुझे रोज स्कूल भिजाती ,

जीवन में पढ़ाई का महत्व सिखाती थी मेरी पर दादी !

 

कभी अपनों से रोता था,

तो कभी चैन से न सोता,

सीने से चिपका के, रात भर लोरी सुनाती थी मेरी पर दादी !

 

चेहरा मुरझाया सा था,

बाल भूरे से थे उनके ,

मुझे लेप लगाती, काले टीके से सजाती थी मेरी पर दादी !

 

माटी के खिलौने बनाती,

लड़कों के घरौंदे सजाती ,

घर के कोने में, तुलसी की माला भजति थी मेरी पर दादी !


कांपती, खांसती खाकारती ,

पर खुद को खुद ही संवारती,

दादा जी प्रेम में चूल्हे पर खुद खाना पकाती थी मेरी पर दादी !


हाथ कंगन, मोटे पैजनिया

सोने की मोती, मटर माला

बो निर्मोही, सब कुछ मुझ पर लुटाती थी मेरी पर दादी |

 

बड़े पूण्य धर्म किये होंगे कर्मों के,

कष्ट भी तो सहे होंगे अपने दुखड़ों के,

पर  परियों की कहानी सुनाकर, खूब हँसाती थी मेरी पर दादी  !

 

आपकी दुआओं से खूब फल-फ़ूल रहा हूँ, म्रें !

ईश्वर से आपको लौटाने का बोल रहा हूँ, में !

आप ही मेरा साहस, आप ही मेरी प्रेरणा हो !

आप ही मेरी दादी माँ, आप ही मेरी यशोदा हो ||

 

मंगलवार, 8 जून 2021

 

आपका पोता

मुरारी लाल राय

सरकारी मास्टर

 

 

 


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