मैं हूं गप्पी।
कोई कहे मोहे ज्ञानी, कोई समझता अभिमानी।
में हसमुख सा, कलार OBC का सादा सा प्राणी।।
कोई सुनता है मुझसे बातें , कोई सुनावत बातें।
में संघर्षी, ना सो पाऊं कई दिन और कई रातें।।
टीला निवासी, महल अटारी में कभी रह न सका ।
में तंगहाली, अपने अधूरे वादों को निभा न सका।।
ठोकरें खाते खाते , ग़म खाना सीख गया।
में सहनसी, रूठों को मनाना सीख गया।।
कम पढ़ा हूं, पड़ा रहा बड़े नवोदय के आवास में ।
में दुखिया , फर्क न समझा अपनों के विश्वास में ।।
कम आयु था, कलंक लगा मेरे अधूरे इतिहास में।
में अभागी,जिंदा बना रहा बिना दूध और प्यास में ।।
नाम जिसने रखा मेरा, वो मतलब न बता गई।।
में दोषी सा, गलती है क्या? माई न रटा गई।।
ठोकर से ठोस बना, ग़म पी कर सदां हंसता रहा ।
में जोकर सा, बिना बात के वादों में फंसता रहा ।।
है मुझमें भी लाख बुराई, न जानूं अपनों की चतुराई।
में शक्कर सा मीठा बोलूं, मिटाता फिरता पीर पराई।।
जो जानें हीरो कहते, न जाने तो अधूरा जीरो समझें।
में रंगमंची, सब हंसी देखते, आंसू मेरे मोती समझें।।
हूं अकेला, रहता जीभ सा दांतों के इस काय में ।
में गप्पी सा, गप्पें सुनाता संकट के इस साय में।।
सबसे हो प्रेम, बैर किसी से होने न पाए।
में मार्गदर्शी, पैर किसी के कांटे न आए।।
सबका हो कल्याण, बच्चे मेरे भी फूलें- फलें ।
में अज्ञानी , चलो फिर से किसी स्कूल चलें।।
जीवन जल का बुलबूला , प्रेम करें, घुले मिलें।
में खौजी सा, ख़ुशी ख़ुशी अपने घर लौट चलें ।।
आपका
मुरारी लाल राय गप्पी'
शिक्षक

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