आह! मेरी सेलरी सहेली
पूरे महीने बाद है आती, सज धज के खाते में सहेली /
ऐसा लगा अब तो ह्लः होगी घर के खाने की पहेली //
सैलरी एक ऐसी ठिठोली /
आशयों की है हमजोली //
नजर पड़ी जब सूनी कलाई पर /
बहन मांगे मोबाइल ‘राखी’ पर //
भाई जो हूँ कमी कैसे करू इस अवसर पर /
फिर न लगने पाए दोष, कंजूस ‘मास्टर’ पर //
धीरे से भाई बोला भैया क्या गाड़ी का पेट भरा दिया? /
हक़ से ‘प्रिये’ बोली ‘कार्ड’ दो, साडी लेने को लेट करा दिया //
सहेली के टुकड़े कैसे करुं /
पिछली EMI कैसे भरू //
अश्रु डाल दिए सहेली ने जब कांपती आवाज दी सुनाई /
वेटा बहुत दर्द होवे जोड़ों में, कब तक लायेगा मेरी दवाई //
टूशन से जब लौटा वेटा, बोला रोते हुए रखकर थेला |
अब तो तरश करो पापा, फट गया पेंट और फट गया लंगोटा //
वाल सखा ने हालत देख, मार लिया जब ताना /
‘मास्टर’ चीश होते हे, इन्हे खर्च करना नहीं आना //
सहेली बोल उठी पीछे से, अब और न चिथड़ा करो /
कुछ तो बचने दो खाते में, कुछ तो इसमें छोड़ा करो //
रात हुई निंदिया भी मांगे, सोने को कमरा ‘ठंडा’ /
कट रही जिंदगी तंगी में , चले न हमारा कोई ‘धंधा’ //
रात चांदनी आकर बोली “सो जा प्यारे ,
बरना यूँ फ़िक्र में लगा ना लेना फंद /
इतना ही था तुम दोनों का सांग” //
फिर आएगी एक दिन सैलरी तब तक तू धीरज धरना /
कट जाएगी हर मुसीबत, अब कभी न ‘नीरश’ रहना //
कम खा-गम पी ले, नहीं मिलती अब पुरानी पेंशन /
शांति से काटे जिंदगी , कभी ना ले मुरारी टैंशन //
मंगलवार, 11 मई 2021 |
स्वरचित कविता :- मुरारी लाल राय
माध्यमिक शिक्षक
शास. मॉडल स्कूल करेरा जिला शिवपुरी (म.प्र.)
Mob. 917976550
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