Thursday, 6 May 2021

हे! महावीर, महिमा दिखाओ! कविता :- मुरारी राय

 


हे! महावीर, महिमा दिखाओ!

हम मूर्ख-सी रचना तेरी , फूटी-सी है रस-प्याली मेरी 

स्वार्थी-आँखें शक्लें भोली, रीति-सी है शब्द-गठरी मेरी |

जनता तेरी टूटी-सी खटिया, जो कोई बैठे धोंस जमाये

कोई न हमको राह दिखाता, न कोई बैध पीर मिटायें||

गंगा माई का मोल न समझें, मलत फिरत हाथन में हाला

लाज नयनों से ओझल करके, ढंकत फिरत जमघट में नासा |

भाव समझ कर आना भगवन, हम तेरे है न समझो जाए पराए

हम मूर्ख तुम्हारी भक्ति न जानें, तुम्ही सबको राह दिखाए ||

टूटे काट की मेरी नैय्या, न पतवार न कोई खिवैया

कैसे पार लगाऊ मैया , न परिवार न कोई मिडैया |

‘तुलसी-सूर’ की पढ के साखी, तुम्हरी महिमा जान न पाई

तुम्ही हो कलयुग में साथी, तुम्हरी सेवा कर न पाई ||

बिछड़ गया है कुनवा मेरा, बिखर गई भजनों की माला 

जन नायक सब दूर से देखें, कोऊ न औषधी खोज को जाता |

हे! महावीर, राम भक्त तुम परम वीर, अपनी महिमा दिखाओ 

राम संतति मूर्छित हो गई, संजीवनी लाकर सुधवुध लौटाओ ||

Thursday, May 06, 2021

कविता:- मुरारी लाल राय `गप्पी`

शिक्षक

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