हे! महावीर, महिमा दिखाओ!
हम मूर्ख-सी रचना तेरी ,
फूटी-सी है रस-प्याली मेरी
स्वार्थी-आँखें शक्लें
भोली, रीति-सी है शब्द-गठरी मेरी |
जनता तेरी टूटी-सी खटिया,
जो कोई बैठे धोंस जमाये
कोई न हमको राह दिखाता, न
कोई बैध पीर मिटायें||
गंगा माई का मोल न समझें, मलत फिरत हाथन में हाला
लाज नयनों से ओझल करके, ढंकत फिरत जमघट में नासा |
भाव समझ कर आना भगवन, हम तेरे है न समझो जाए पराए
हम मूर्ख तुम्हारी भक्ति न जानें, तुम्ही सबको राह दिखाए ||
टूटे काट की मेरी नैय्या, न
पतवार न कोई खिवैया
कैसे पार लगाऊ मैया , न
परिवार न कोई मिडैया |
‘तुलसी-सूर’ की पढ के साखी,
तुम्हरी महिमा जान न पाई
तुम्ही हो कलयुग में साथी,
तुम्हरी सेवा कर न पाई ||
बिछड़ गया है कुनवा मेरा, बिखर गई भजनों की माला
जन नायक सब दूर से देखें, कोऊ न औषधी खोज को जाता |
हे! महावीर, राम भक्त तुम परम वीर, अपनी महिमा दिखाओ
राम संतति मूर्छित हो गई, संजीवनी लाकर सुधवुध लौटाओ ||
Thursday, May 06, 2021
कविता:-
मुरारी लाल राय
`गप्पी`
शिक्षक

Very nice
ReplyDeleteDoing great keep it up😊
Situation according poem bhaisahab 🙏🙏🙏🙏🙏
ReplyDeleteGood sir ji
ReplyDelete👌👌👌👌👌
ReplyDeleteक्या लिखते हो सर ज
ReplyDeleteMast poem sir ji
ReplyDeleteAccha likhne page ho
ReplyDelete