Monday, 9 June 2025

शिक्षक की अभिलाषा


 शिक्षक की अभिलाषा

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(शिक्षक- समाज को समर्पित कविता)


शीश नवा हाथ जोड़ प्रेम भाव से करता हूं सभी को नमन।

स्वास्थ रखे ईश्वर सभी को, हो जीवन में खुशियों का आगमन ।

हो कल्याण आप सभी का, बच्चे सभी के फूलें फलें।

आएं बहार आपके जीवन में, उन्नति के सभी द्वार खुलें।।


 मैं हूं एक साधारण शिक्षक,

 करता जन सेवा, पोथी का रक्षक।

सौम्य भाव से सबका आदर पाता,

सब पेट भर खा लें, फिर में खाता।।


आज नए युग में बड़े बदलाव है आए 

लोगों ने ना जाने क्यूं कर दिए हमें पराए ।


होता समाज का दर्पण, साहित्य सृजन में।

होता नाव का अर्पण , शांत निर्मल जल में

दिखे शक्ति प्रदर्शन, मेला के समतल रण में,

शिक्षक होता अवश्यकता, जीवन के हर क्षण में।।


जीवन में निराशा छाने लगे, शंका के मेघ मडराने लगें।

याद कर लेना अपने गुरुवर को, संकट सारे टलने लगें।।


देश की तस्वीर बनाते हम शिक्षक,

बिगड़ी तकदीर बनाते हम शिक्षक,

रहती न कहीं कोई कमजोर कड़ी,

अपने सुख चैन का त्याग करें हम शिक्षक। 


आज समय की पीड़ा देख कर, 

भाव रोक नहीं में पाता हूं।

उमड़ पड़ते है आंशू यूं ही,

दर्द भरी दास्तां सुनाता हूं।


नए युग में कहां से, सुंदर फोन चलन में  आ गए।

नई पीढ़ी बरवाद हो रही, उजाले ने आंखो से  जा रय।।


बच्चे भूल रहे अपने  गुरु जी ,

दिनरात खेलत बिना थके पब जी।

सरकारें नहीं देती शिक्षा निःशुल्क अब हायर ।

युवा पीढ़ी दिन रात खेले फ्री फायर।।


सबसे ज्ञानी गूगल हो गया

बिना गेंद के भूगोल हो गया

भिविषण को कौन पूछता,

भेदी तो ये  फोन हो गया।।


साधन नहीं थे आदिकाल में

संघर्ष करते थे हरहाल में

योग्य बने,निरोग रहे चिरकाल में।

खड़ा कर दिया चन्द्रगुप्त कम अंतराल में।।


मेरी महिमा को न विसराओ तुम,

मेरे तप त्याग को न भुलाओ तुम,

बांध रखा है बांध अपने सब्र का , 

न दिखाना ज़ोर अपने उग्र भाव का,


प्रलय को सदा ही मैने अपने आंचल में छिपाया है

निर्माण करने में लगा हूं, नहीं लगता कोई पराया है।।

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स्वरचित कविता

मुरारी राय

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